हाईवे कि चिकनी काली सड़क पर जंगल के बीचों-बीच, धुंध उड़ाती हुई, एक गाड़ी रुकी आकर जिसमें से खाकी वर्दी पहने, दो पुलिस वाले गाड़ी से नीचे उतरे। वे दोनों पुलिस वाले उन बच्चों कि तलाश में वहाँ पहुँचे थे, जिन्हें गायब हुए कई महीने बीत चुके थे।
अमन रोय जिसे पुलिस कि नई नौकरी और सब इंस्पेक्टर के नए पद के साथ अभी कुछ दिन ही हुए थे। वर्दी पर दो सितारों का गुरूर उसकी आँखों में चमकता था। उसे कुछ ऐसा चाहिए था जिससे पुलिस विभाग में उसका नाम रोशन हो सके और अति शीघ्र उसकी पदोन्नति भी हो सके। अमन स्वयं को एक मसीहा समझता था, लोगों को बचाने वाला हीरो, जिसे अपने जीवन से अधिक दूसरों के जीवन कि चिंता होती है, लेकिन उसमें ऐसा कोई गुण नहीं था।
एक दिन एक ऑटो वाला पुलिस स्टेशन आया।
“ सर, मेरा नाम बिपिन कुमार है और मैंने बाहर ये पोस्टर लगा देखा। ” ऑटो वाले ने एक हवलदार को एक पोस्टर दिखाते हुए कहा, जिसमें अश्वत, रचित, विक्रम और मेघना कि तस्वीरें थीं।
“ हाँ तो, यह तो कई महीनों से लगा है। ” हवलदार ने जवाब दिया।
“ लेकिन सर, आखिरी बार मैंने इन बच्चों को कोटला हाउस के रास्ते पर छोड़ा था। उन लोगन ने कहा था कि उन्हें कोटला हाउस जाना है। ” ऑटो वाले ने बताया।
“ और तुमने उन्हें छोड़ भी दिया! ” हवलदार भड़कते हुए बोला। “ तू जानता भी है, कोटला हाउस कितनी मनहूस जगह है और तूने उन बच्चों को वहाँ अकेला छोड़ दिया। ”
“ अकेले कहाँ हैं, चार तो हैं! ” ऑटो वाला पोस्टर देखते हुए बोला।
“ पक्का यही बच्चे थे? ” हवलदार ने शांत हो कर पुष्टि करते हुए पूछा।
“ सर हमारे बच्चों कि कसम, यही बच्चे थे। ” ऑटो वाला पूरे दृढ़ विश्वास से बोला।
“ इन बच्चों के गायब हुए पूरे नो महीने बीत चुके हैं और तुम्हें अब समय मिला, यह सब बताने का। ” हवलदार कठोरता से बोला।
“ क्या नाम बताया जगह का? ” अचानक सब-इंस्पेक्टर अमन रोए ने पूछा। वह उन लोगों कि बातें काफी देर से सुन रहा था। उसे जैसे ही उन गुमशुदा बच्चों कि खबर मिली, उसने उस केस को अपने हाथों में लेने का निर्णय ले लिया और फिर यही वो केस था, जो उसका जीवन बदलने वाला था।
“ कोटला हाउस! ” ऑटो वाले ने उत्तर दिया।
“ कहाँ है यह कोटला हाउस? जब से यहाँ आया हूँ, तब से इस जगह का नाम कई बार सुन चुका हूँ। ” अमन रोए ने ऑटो वाले से पूछा।
ऑटो वाले ने उत्तर दिया, “ साहब! जंगल में एक भूतिया घर है, उसी घर का नाम कोटला हाउस है। अब पता नहीं ये बच्चे वहाँ का करने गए थे, लेकिन उन्हें कोटला हाउस जाना था और हमारा काम उन्हें वहाँ तक पहुँचाना था, हमने अपना काम किया और चुपचाप चले आए। ”
“ उन बच्चों ने तुम्हें वहाँ रुकने के लिए नहीं कहा? ” अमन ने ऑटो वाले को संदेह भरी दृष्टि से देखते हुए पूछा।
ऑटो वाले ने नज़र चुराते हुए कहा, “ उन बच्चों ने तो नहीं कहा, पर हमने खुद उनसे रुकने के लिए भी पूछा, लेकिन उन्होंने हमें यह कहकर भगा दिया की… कि कुछ देर बाद उन्हें उनकी गाड़ी लेने आ जाएगी। ”
“ क्या तुमने उन बच्चों को कोटला हाउस के अंदर जाते हुए देखा था? ” हवलदार ने पूछा।
“ कोटला हाउस के अंदर का, बल्कि हमने तो उन्हें जंगल के भीतर भी जाते हुए नहीं देखा। हम बता तो रहे हैं, हमने उन्हें उतारा, अपना ऑटो घुमाया और सीधे भगाए लिए चले आए। अब उस भूतिया जंगल में कौन रुकना चाहेगा। ”
अमन और उसका साथी हवलदार, वे दोनों जंगल के उसी मार्ग पर खड़े थे जिस मार्ग पर कोटला हाउस पड़ता था। अमन कि उम्र पच्चीस वर्ष थी और वह हवलदार उससे मात्र दो वर्ष बड़ा था। अमन उस हवलदार को अपने साथ उस स्थान पर ले आया जहाँ उस ऑटो वाले ने उन बच्चों को छोड़ा था।
“ सर, आपको सच में लगता है कि वे बच्चे कोटला हाउस गए होंगे क्योंकि आप तो इस शहर में नए हो लेकिन वे बच्चे, वे तो इसी शहर के हैं और वे अच्छे से जानते होंगे कि कोटला हाउस भूतिया है, तो वो लोग भला उस घर में क्यों जाएंगे? ”
“ तुम लोग इतना डरते क्यों यार! भूत जैसी चीज़े न, नब्बे के दशक में होती थीं। अब यह बताओ कोटला हाउस है कहाँ? ” अमन को फिल्में देखने का बहुत शौक था इसलिए उसकी आदत भी फिल्मी अंदाज में बात करने कि पड़ चुकी थी।
“ मुझे ठीक से नहीं पता लेकिन इस जंगल में यहीं कहीं होना चाहिए! ” हवलदार सोचते हुए बोला, उसे सटीक जानकारी नहीं थी कि कोटला हाउस कहाँ था। लेकिन अमन को उस पर विश्वास नहीं हुआ।
“ डर के चक्कर में नहीं बता रहे ना? ” अमन ने अविश्वास से कहा।
“ यह मत भूलो कि तुम ड्यूटी पर हो और मैं तुम्हारा सीनियर हूँ, इसलिए तुम्हें मेरी हर बात मानने पड़ेगी। ” उसने कठोरता से कहने का दिखावा किया, उसके चेहरे पर सीनियर होने का गुरुर साफ दिख रहा था। अमन प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ बोलेगा लेकिन हवलदार चुपचाप खड़ा रहा, कुछ न बोला। तभी अमन ने यह निर्णय लिया कि वह खुद कोटला हाउस को ढूँढ लेगा।
“ चलो! अगर तुम्हें नहीं पता तो… मुझे ही ढूँढ़ना पड़ेगा। ” अमन ने कहा। “ उस ऑटो वाले ने कहा था कि जहाँ जंगल के बीच पेड़ों कि संख्या कम हो जाए, वहीं कोटला हाउस होगा। ” इतना कहते ही वह बिना डरे जंगल के भीतर घुस पड़ा और वह हवलदार भी उसके पीछे पीछे चल दिया। अमन भूतों पर विश्वास नहीं करता था और ना ही किसी से डरता था।
“ सर! लोग कोटला हाउस के नाम से भी डरते हैं और आप उसी घर को तलाश कर रहे हैं। मेरी मानिए, तो वापस लौट चलिए। ” हवलदार ने घबराते हुए कहा।
“ एक बार कदम आगे बढ़ाने के बाद, पीछे नहीं लेता मैं। मैं उस घर को नहीं, बल्कि उन बच्चों को तलाश कर रहा हूँ। बच्चे बहुत चालाक होते हैं, जब मुसीबत में होते हैं तो कोई ना कोई निशानी जरूर छोड़ देते हैं। ” अमन ने आगे चलते हुए कहा।
“ एक बात बताओ यार! मैं जबसे इस शहर में आया हूँ, मैंने कोटला हाउस का नाम बहुत सुना है। आखिर ऐसा क्या है उस घर में, जो लोग उस घर से इतना डरते हैं? ” अमन ने पूछा।
“ लोगों का कहना है कि उस घर में एक नहीं बल्कि कई भूतों का निवास है। इस पूरे अठारह किलोमीटर के रास्ते पर एक भी होटल या रिसॉर्ट नहीं है इसलिए उस घर को कई बार बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने खरीदकर, वहाँ एक होटल का निर्माण करने के बारे में सोचा लेकिन आज तक कोई भी उस घर को खरीद नहीं पाया, क्योंकि खरीदने वाले, या तो मारे गए, या हमेशा के लिए कहीं गायब हो गए।
हमारे ही शहर के, रामचंद्र नाम के एक बड़े उद्योगपति ने भी कोटला हाउस को खरीदने कि कोशिश की थी, लेकिन वे भी तीन महीने से लापता हैं और कोई नहीं जानता वह कहाँ हैं? जिंदा भी हैं या मर गए? ”
“ ये जितने लोगों का नाम भी कोटला हाउस से जुड़ा है, वे सभी लापता क्यों है? ” अमन के मन में अब कोटला हाउस से जुड़े रहस्य ओर भी अधिक खटकने लगे।
“ क्योंकि उस घर से जुड़ी सारी कहानियाँ सच हैं, सर। सुना है कि आज तक जो भी उस भूतिया घर में गया है, वो कभी बाहर नहीं आया और इसी डर से कोई पुलिसवाला भी उस घर के अंदर जाने कि हिम्मत नहीं करता। ”
हवलदार कि बातें सुनकर अमन को एक मौका नज़र आया, उसे लगा कि अगर वह उस घर में जाकर उन बच्चों को ढूँढ लाए या उस घर के रहस्यों को पूरी दुनिया के सामने लाकर रख दे, तो वह पहला ऐसा पुलिसवाला बन जाएगा जो उस घर के अंदर जाकर, जिन्दा और सही सलामत बाहर आया होगा।
“ तो फिर यह तो हमारे लिए खुशखबरी है। हम पहले ऐसे पुलिस वाले होंगे जो उस घर से जिन्दा बचकर बाहर आऐंगे और फिर उस घर से ज्यादा हमारा नाम होगा। ” अमन ने गर्व से कल्पना करते हुए कहा।
“ लेकिन मैं आपके साथ उस घर में नहीं जाने वाला और मैं आपसे भी यही कहूँगा कि आपको भी उस घर में नहीं जाना चाहिए। ” हवलदार घबराते हुए बोला।
“ तुम्हारा नाम सागर है ना, इसलिए तुम्हारे अंदर कुछ करने कि प्यास नहीं है, लेकिन मैं… अब उस घर के अंदर जाऊँगा भी और बाहर भी आऊँगा। ” अमन बहुत हिम्मत से बोला।
“ क्या रामचंद्र भी उस घर में जाने के बाद लापता हुए थे? ” अमन ने पूछा।
“ किसी को नहीं पता कि उनके साथ क्या हुआ था, क्योंकि उनकी और उनके साथियों कि लाश कभी नहीं मिली लेकिन उनके गायब होने के कुछ दिनों बाद, उनकी गाड़ी नार्गो झील में डूबी हुई मिली थी। ” सागर ने उत्तर दिया।
“ वही झील न, जो रातों-रात सूख गई थी! ” अमन उस झील के बारे में स्मरण करते हुए बोला।
“ हाँ! सही कहा, उस झील के सूखने के कारण ही तो रामचंद्र की गाड़ी मिल पाना संभव हुआ था। ”
अमन ने अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाए और इन रहस्यों को समझने का प्रयास करते हुए पूछा, “ वह झील यहाँ से कितनी दूर है? ”
“ यहाँ से लगभग आठ किलोमीटर दूर। क्यों? ”
“ यह काम किसी भूत-प्रेत का नहीं हो सकता, क्योंकि भूतों को सबूत छुपाने कि जरूरत नहीं पड़ती। मुझे तो लगता है कि उस घर में ज़रूर कोई कालाकांडी चल रही है। अगर रामचंद्र कि गाड़ी यहाँ से आठ किलोमीटर आगे किसी झील में पड़ी मिली थी, तो इसका यही मतलब है कि वह उस घर में जरूर गए होंगे, लेकिन वहाँ किसी व्यक्ति ने उनका खून कर दिया और पुलिस को भटकाने के लिए उनकी गाड़ी को उस झील में डूबा दिया और भूतिया अफवाहों के कारण किसी ने भी उस घर कि तलाशी नहीं ली होगी। हैं ना? ” अमन ने अपनी ही एक काल्पनिक कहानी बनाकर, उसे सत्य मान लिया।
“ अगर आप सही भी हुए तो हम दोनों का वहाँ अकेले जाना खतरे से खाली नहीं है। ” सागर ने राय देते हुए कहा।
“ अकेले कहाँ हैं, हम दो लोग हैं। ” अमन ने ऑटो वाले कि बात याद करते हुए, सागर कि बात को मज़ाक में टाल दीया। अमन किसी को भी अपने काम का श्रेय नहीं देना चाहता था, इसलिए वह अकेला ही उस घर के रहस्यों को उजागर करके अधिक से अधिक प्रसंशा प्राप्त करना चाहता था।
लगभग एक घंटे के अथक परिश्रम के बाद वे दोनों कोटला हाउस के बाड़े तक जा पहुँचे। अनसुलझे रहस्यों से भरे, उस भयानक और विचित्र घर के पास लोग भटकते तक नहीं थे लेकिन अमन उस घर के सामने, अपने दोनों हाथ कमर पर टिकाए, सीना तान के खड़ा था।
अमन लम्बे कदमों के साथ आगे बढ़ने लगा, तभी उसने महसूस किया कि वह उस घर कि तरफ अकेला जा रहा था। उसने पीछे मुड़कर देखा, सागर अभी भी बाड़े के उस पार खड़ा था।
“ क्या हुआ? ” अमन ने पूछा।
“ आप जाइए, लेकिन मैं इस घर में बिल्कुल नहीं जाने वाला। ” सागर ने डरे हुए स्वर में कहा।
“ देखो, अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो यह जानने कि कोशिश जरूर करता कि साला ऐसा इस घर में क्या है, जो लोग अंदर तो जाते हैं लेकिन फिर उनका बाहर आने का मन ही नहीं करता। ” अपनी अंतिम बात कहते हुए वह मज़ाक में हँसने लगा, उसे अभी भी ये सब एक मज़ाक लग रहा था। लेकिन उसकी बात का सागर पर कोई असर होता हुआ नज़र नहीं आया। इसलिए उसने सागर को भावनात्मक रूप से मानने का प्रयास किया, “ अगर अंदर जा कर मुझे कुछ भी हुआ, तो ये आपकी जिम्मेदारी होगी। ” इतना कहने के बाद अमन थोड़ी देर तक सागर का चेहरा देखता रहा। लेकिन वह कुछ न बोला, चुप चाप खड़ा रहा।
बिना अधिक रुके, अमन पुनः उस घर कि तरफ चल दिया। सागर अमन को रोकना चाहता था, लेकिन वह जानता था कि अमन उसकी बात नहीं मानेगा, पर उसको अकेले जाता देख सागर को उसकी चिंता होने लगी। वह परेशान था, उसे निर्णय लेने में बहुत कठिनाई हो रही थी कि उसे अमन के साथ जाना चाहिए या नहीं, तभी अचानक उसने अमन के साथ जाने का निर्णय लिया।
अमन ने अंदर जाने से पहले, कोटला हाउस के उस मुख्य द्वार के समक्ष खड़े हो कर, सतर्कता बरतते हुए अपनी बँदूक निकाली, लेकिन उसकी बँदूक खाली थी और यह बात उसके अलावा कोई नहीं जानता था, सागर भी नहीं। उसने सागर को इसलिए नहीं बताया क्योंकि वह उसके सामने स्वयं को मूर्ख नहीं दिखाना चाहता था।
अचानक उसका ध्यान एक विशेष सूचना पर गया, जो दरवाज़े पर लिखी हुई थी। विशेष सूचना - जो एक बार अंदर गया, वो कभी बाहर नहीं आया। सोच समझकर प्रवेश करें। धन्यवाद।
“ ये भी तुम्हारे भूत ने लिखा है क्या! ” अमन ने व्यंगात्मक स्वर में सागर से कहा, लेकिन सागर उसकी बात सुन नहीं सका क्योंकि वह अब तक अमन के पास नहीं पहुँच पाया था।
अचानक अमन ने उस लकड़ी के दरवाज़े पर एक ज़ोरदार लात मारी, लेकिन उसके पैर कि मार से दरवाज़ा खुलने के स्थान पर टूट गया और उसका पैर दरवाज़े में ही अटक गया। वर्षों पुराना लकड़ी का वह दरवाज़ा बहुत कमज़ोर हो चुका था इसलिए अमन का पैर उसके आरपार हो गया।
अमन अपने एक पैर से संतुलन बनाते हुए संभलने कि कोशिश कर ही रहा था कि सागर ने उसे गिरने से बचा लिया। उसने संभाल कर अपना पैर बाहर निकाला।
इस बार अमन ने लात मारने के बजाय दरवाज़े को अपने हाथों से खोलना अधिक उचित समझा। उसने दरवाज़े को धक्का देकर खोलने का प्रयास किया लेकिन पहली बार में दरवाज़ा नहीं खुला।
उसने फिर से कोशिश की लेकिन वह असफल रहा, तभी सागर ने आगे आकर दरवाज़े को एक दमदार धक्का दिया और दरवाज़ा खुल गया। दरवाज़ा खुलते ही, अमन ने सागर को विचित्र निगाहों से घूरना शुरू कर दिया।
वह मन में यही विचार कर रहा था कि सागर के एक छोटे से धक्के से दरवाज़ा खुल कैसे गाय, शायद मेरे दो बार धक्का देने से दरवाज़ा ढीला पड़ चुका था, अगर मैं एक ओर बार धक्का दे देता तो दरवाज़ा आसमान कि तरह फट जाता, शायद! टूट भी सकता था। अच्छा हुआ मैंने तीसरा धक्का नहीं दिया।
अपने विचारों में ही मग्न हो कर वह मुस्कुराने लगा, उसके चेहरे कि मुस्कुराहट देख सागर ने पूछा, “ क्या हुआ, सर! आप मुस्कुरा क्यों रहे हैं? ”
“ तुम मेरे साथ हो, इससे बड़ी खुशी कि क्या बात हो सकती है। ” उसने झूठा दिखावा करते हुए कहा। सागर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान खिल गई।
अमन ने अपने लक्ष्य को याद करते हुए, घर में प्रवेश किया। घर में घुसते ही उसे घर के अंदर चार लोग नज़र आए। उनमें से तीन हष्ट-पुष्ट कसरती शरीरी वाले पहलवान दिख रहे थे, जो किसी साधारण व्यक्ति को आराम से हवा में उछाल सकते थे। वे तीनों पहलवान काले कपड़े पहने, अंगरक्षकों कि भाँति खड़े हुए थे। उनमें से एक व्यक्ति काला कोट-पैंट पहने सोफे पर आराम से बैठा हुआ था, जो संभवतः उन तीनों पहलवानों का मालिक था।
“ Hands up! ” अमन ऊँची आवाज़ में उन सबको सावधान करते हुए बोला। अमन और सागर ने उन्हें देखते ही, उन लोगों पर बँदूक तान दी। सोफे के सामने एक काँच के टेबल पर एक सूटकेस और चाय के तीन कप रखे हुए थे, जिन्हें देखकर सागर को तो विश्वास ही नहीं हुआ, क्योंकि उसने सोचा भी नहीं था कि उस घर में उन्हें भूत नहीं बल्कि जीवित मनुष्य चाय पीते हुए, किसी मीटिंग में संलग्न मिलेंगे।
अपने आप को अपराधी समझते हुए, उन चारों ने डरकर अपने हाथ ऊपर कर दिए। वे तो इस असमंज में पड़े थे कि उनका दोष क्या था और वे पुलिस वाले असमय ही कहाँ से आ टपके थे और क्यों?
“ ये तीनों तो भूत लग भी रहे हैं, लेकिन सोफे पर बैठा आदमी तुम्हें कहीं से भूत लग रहा क्या! ” अमन ने उन पहलवानों के भयानक शरीर और काले रंग का मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
“ ओ, इंस्पेक्टर! अपनी हद में रह… हम तीनों भूत नज़र आ रहे हैं तुझे और तुम लोग यहाँ करने के आए हो। ” उनमें से एक पहलवान भड़कते हुए बोला, जो सोफे पर बैठे आदमी के बगल में ही खड़ा था। उसने गले में एक सोने कि चैन डाली हुई थी और चाँदी कि दो अँगूठियाँ पहनी हुई थीं।
“ ऐ! ये मेरा डायलॉग है। तुम लोग यहाँ क्या कर रहे हो और बच्चे कहाँ हैं? ” अमन ने बड़े रुआब से पूछा।
“ ऐ, इंस्पेक्टर! पागल हो गया है क्या! कौन से बच्चे, कैसे बच्चे? ” उसी पहलवान ने पूछा।
अमन अपनी ज़ुबान से पलटवार करने ही वाला था कि अचानक सागर सोफे पर बैठे आदमी को देखकर सोचते हुए बोला, “ आपको… लगता है मैंने आपको पहले भी कहीं देखा है। ”
“ हमें इस शहर में कौन नहीं जानता लेकिन अगर तुम लोग हमें जानते होते तो हमपर बँदूक तानने से पहले दस बार सोचते। ” सोफे पर बैठा आदमी, बहुत घमंड से बोला। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा कर्कशपन था, जिसके कारण सुनने वाले को सिरदर्द होने लगता था। उसकी आवाज़ सुनने वाले के कानों में बहुत चुभती थी, वह स्वयं भी यह बात जानता था, इसलिए वह अधिक बोलता नहीं था।
उन पहलवानों का मालिक होने के बावजूद भी, न तो उसके गले में सोने की कोई चैन थी और न ही उँगलियों में कोई महंगी अँगूठियाँ।
“ तू कोई भी हो लेकिन मैं दुबारा तेरी फटी हुई आवाज़ नहीं सुन सकता। ” अमन ने पहली बार उसकी आवाज़ सुनी लेकिन उसकी विचित्र कर्काशपूर्ण आवाज़ ने उसे परेशान कर दिया। अमन ने ऐसा दिखावा किया जैसे उसकी आवाज़ से उसकी जान ही जाने वाली थी।
“ तू जानता भी है, ये रामचंद्र के साले पुष्पा भंडारी हैं। ” वही पहलवान दुबारा बोला, जैसे उसने उस आदमी के बारे में कोई विशेष तथ्य बताया हो जिसे सुनने वाला संभवतः उसका आदर करने लगता होगा।
“ पर सीता माता का तो कोई भाई नहीं था। ” अमन फिर से उनका मज़ाक उड़ाते हुए बोला, उसके मज़ाक से हुए क्रोधित चहरों को देख, उसे बहुत आनद मिल रहा था।
“ अच्छा! अच्छा! ये वही रामचंद्र तो नहीं जिसके बारे में तुम मुझे बता रहे थे। ” उसे झटके से याद आया और सागर से पूछते हुए बोला।
“ पर वो लोग तो तीन महीने पहले ही मर चुके हैं! ” सागर ने अमन के कान में फुसफुसाया।
“ तुमने ही कहा था कि पुलिस को आज तक उनकी लाश तक नहीं मिली, तो इस बात कि कोई गारंटी नहीं है कि वो मर चुके हैं। इसलिए मुझे लगता है यह सच कह रहा है। ” अमन ने सागर को समझाया।
“ तुमने रामचंद्र को देखा है ना? ” अमन ने पूछा। सागर ने हाँ में सिर हिलाया।
अमन ने मन में विचार किया - अगर मैं रामचंद्र को ढूँढ़ निकालूँ तो यह मेरे लिए उन बच्चों को ढूँढ़ने से ज्यादा फायदेमंद होगा, क्योंकि रामचंद्र एक जाना माना नाम है, वह शहर का पहुँचा हुआ उद्योगपति था और अगर मेरे सामने बैठा आदमी रामचंद्र का साला है, तो संभव है कि रामचंद्र भी जिन्दा हो।
अमन को उसकी लाश भी मिल जाती तो उसके लिए वो भी काफी थी, इसलिए अब अमन का मुख्य लक्ष्य रामचंद्र को ढूँढना था, उन बच्चों को नहीं।
वे चारों इस विस्मय में पड़े थे कि वे दोनों पुलिस वाले उनके बारे में क्या कानाफूसी कर रहे थे, तभी अचानक अमन बोल पड़ा, “ ठीक है! तुम लोगों के लिए एक नया सवाल, रामचंद्र कहाँ हैं? क्योंकि हमने सुना है कि उनकी जान को, उनके अपनों से खतरा है। ” अमन सोफे पर बैठे पुष्पा भंडारी को घूरते हुए बोला।
पुष्पा भंडारी को यह बात साफ-साफ समझ में आ रही थी कि अमन का संकेत किसकी तरफ था, इसलिए उसने आवेश में आकर कहा, “ अगर उन्हें कोई खतरा है भी, तो उसके लिए उन्हें पुलिस कि कोई जरूरत नहीं है। ”
“ अपना घटिया मुँह बंद रख, यार! जब भी बोलता है, मेरा सिर दर्द होने लगता है, इतनी घटिया आवाज़ कैसे है तेरी? ” अमन पुष्पा की आवाज़ सुनते ही चिढ़कर बोला और उस आदमी का अपमान कर दिया।
“ ऐ! ” वह पहलवान आग बबूला होकर बड़ी ऊँची आवाज़ में चिल्लाया। वह गुस्से में अपनी बँदूक निकालने के लिए अपना हाथ पीछे ले गया, उसकी कमर के पीछे और पैंट के बीच में दबी वह बँदूक उसका इन्तज़ार ही कर रही थी कि अचानक उसके मालिक ने उसे रौकते हुए उसका हाथ पकड़ लिया और परिस्थिति को ओर अधिक बिगड़ने से रोक लिया। वह अपने क्रोध पर संयम रखते हुए, शांत भाव से चुप चाप बैठा रहा, मानो यह किसी आने वाले तूफान की शांति थी। उसे अपने जीजा कि चिंता हो रही थी, उसने एक नज़र उस हॉल के बाएँ दरवाज़े पर मारी।
अमन और सागर, दोनों को उन लोगों पर कुछ संदेह हुआ और उन्हें आभास हो गया कि उन लोगों के पास हथियार भी थे। अमन ने कनखियों से सागर को उन लोगों की तलाशी लेने का इशारा किया। सागर ने आगे बढ़कर उन लोगों की तलाशी लेना शुरू कर दिया।
जैसे ही वह पहले आदमी कि तलाशी लेने पहुँचा, वह आदमी सागर द्वारा अपनी तलाशी लेने से प्रतिरोध करते हुए बोला, “ मेरे पास कुछ नहीं है। ”
“ अगर मेरे जीजा ने ये सब देख लिया तो वो तुम्हारी वर्दी उतरवा देंगे, समझे! ” पुष्पा ने प्रतीक्षा भरी दृष्टि से हॉल के बाएँ तरफ के दरवाज़े पर नज़र डालते हुए कहा, जैसे उस दरवाज़े से ही उसके जीजा बाहर आकर, उन पुलिस वालों को अच्छे से लताड़ने वाले थे।
सागर को पहले पहलवान के पास कोई हथियार तो नहीं मिला लेकिन उसके पास पाँच-सौ और हजार के कुछ पुराने भारतीय नोट मिले, जो भारत में 8 नवम्बर 2016 के बाद अमान्य हो चुके थे।
सागर को आश्चर्य हुआ कि उसके पास एक भी नया नोट नहीं था, लेकिन उसने इस बात को अधिक महत्व नहीं दिया और उसके पुराने नोट उसे वापस लौटा दिए, फिर वह अगले पहलवान कि तलाशी के लिए आगे बढ़ा।
“ मेरे पास कुछ नहीं है। ” दूसरे पहलवान ने भी वही बात दोहराई। उसके पास भी कुछ पुराने भारतीय नोटों व एक लड़की के फोटो के अतिरिक्त ओर कुछ नहीं था, क्योंकि उन्हें अपने शरीर पर ही इतना घमंड था, जिसके कारण वे लोग हथियार नहीं रखते थे।
सागर ने लड़की का फोटो देखा, लड़की बेहद सुंदर थी, इसलिए उसके बारे में बिना पूछे उससे रहा नहीं गया, “ कौन है ये? ”
“ गर्लफ्रेंड है। ” उस पहलवान ने शर्माते हुए उत्तर दिया।
“ साला! ऐसे ऐसे राक्षसों कि गर्लफ्रेंड्स बन कैसे जाति हैं? ” सागर ने मन में सोचा, उसके विचार उसके चेहरे पर प्रकट हो रहे थे।
“ पकड़! ” सागर ने उसका सामान वापस कर दिया। अब तलाशी की बारी उस आखरी पहलवान कि थी, जो तिलमिलाई नज़रों से सागर को घूर रहा था, जैसे उसे उठा कर पटकने के बारे में सोच रहा हो।
“ एक मिनिट! ” उसकी तलाशी लेने से पहले, अमन सागर को टोकते हुए बोला, “ इसकी तलाशी लेने से पहले, इसका नाम जानना तो बनता है, हैं ना! ”
“ सही कहा, मेरा नाम गोलू है, गोलू! जिस दिन तू मेरे इलाके में मिला, वो दिन तेरा आखरी दिन होगा। ” गोलू ने अमन को चेतावनी देते हुए कहा। शहर में गोलू को कोई पुलिस वाला छू भी नहीं सकता था, लेकिन वे दो पुलिस वाले उसकी तलाशी ले रहे थे, जो उसके लिए उसका अपमान था।
“ ग्… गो… गोलू भईया! मैंने बस आपका नाम सुना था, आपको देखा नहीं था, माफ करना मुझे, मुझसे… मुझसे भूल हो गई। ” अमन लड़खड़ाते हुए, घबराए स्वर में बोला।
“ तुझे क्या लगा मैं ऐसा बोलूँगा। ” अचानक अमन ने अपना स्वर बदलते हुए कहा और ठहाके मारकर हँसने लगा, मानो उसे गोलू का नाम सुनने से कतई फर्क तक नहीं पड़ा था, लेकिन गोलू की चेतावनी का असर सागर पर दिख रहा था।
“ तुझे क्या लगता है, मैं तेरी ये गीदड़ भभकीयों से डर जाऊँगा। अगर तुझे ठोकना होता न, तो तू अब तक ठोक चुका होता, समझा! तेरे पिछवाड़े में रखी बँदूक अब तक रखी नहीं रहती। ” अमन ने निडरता से कहा।
“ और तुम क्यों डर गए, इसने मुझे धमकी दी है, तुम्हें नहीं। ” अमन के बोलते ही सागर गोलू कि तलाशी लेने लगा। तलाशी में उसके पास एक बँदूक निकली तथा पुराने हज़ार के नोटों कि एक पूरी गड्डी ही निकल आई।
नोटों कि उस गड्डी को देखकर रामचंद्र का साला गोलू को शंका की दृष्टि से घूरने लगा।
अमन और सागर ने एक-दूसरे को विस्मय से देखा और फिर अमन ने बड़े ही भावुक भाव से गोलू को घूरना शुरु कर दिया। हैरानी कि बात तो यह थी कि उन लोगों के पास अब तक एक भी नया नोट नहीं मिला था, जिसके कारण दोनों के मन में यह जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि उन लोगों के पास, वे पुराने नोट क्या कर रहे थे। बँदूक के बारे में तो अमन जानना भी नहीं चाहता था।
“ ये पुराने नोट तुमने किसकी याद में रखे हुए हैं, भाई? ” अमन ने बहुत रहस्यमई और प्रेम भरे स्वर में पूछा, उसने पहली बार गोलू को भाई कहकर पुकारा, इसलिए सागर भी इस शंका में पड़ गया कि अचानक अमन का बात करने का स्वर कैसे बदल गया, उसे लगा - अमन फिर से गोलू के साथ मज़ाक कर रहा था।
“ मतलब! ” गोलू ने विस्मय भाव से पूछा। अमन कि दृष्टि में अब, उसे स्वयं के लिए सांत्वना नज़र आ रही थी, अचानक वह अमन को देख देखकर असहज महसूस करने लगा।
फिर अमन ने उन सबको बच्चों की तरह रोते हुए अपनी दुख भरी कहानी सुनाई, “ तुम्हें पता है! मेरी माँ ने मेरे नशेड़ी बाप से छुपाकर, पूरे तीस हजार रुपए जमा किए थे, लगभग इतनी ही मोटी गड्डी थी, लेकिन जिस दिन मोदी जी ने टीवी पर आकर वो मनहूस खबर सुनाई, उसी समय तीस हजार… तीस हजार… बोलती हुई, वो भगवान को प्यारी हो गईं, लेकिन मैं समझ गया कि वो क्या कहना चाहती थीं। जब घर में ढूँढ़ने के बाद वो तीस हजार रुपए मिले, तो मैंने उन्हें बैंक में जमा नहीं किया, बल्कि अपनी माँ कि याद के रूप में हमेशा अपने पास रखता हुँ। ” अमन ने अपनी जैकेट कि अंदरूनी जेब से अपने माँ के जमा किए हुए, पुराने नोटों कि गड्डी निकालकर दिखाई।
गोलू भी अपनी माँ से बहुत प्रेम करता था और अब उसकी माँ भी इस दुनिया में नहीं थीं इसलिए अमन कि दुखभरी कहानी सुनकर गोलू भी भावुक हो गया, उसका मन भी रोने का कर रहा था, लेकिन अपने आप को संभालते हुए उसने कहा, “ मुझे माफ कर दे मेरे भाई! मैंने तुझे मारने कि धमकी दी। ”
“ ऐ! भाई कि बँदूक वापस कर। ” अमन सहसा सागर को डाँटते हुए, सागर से गोलू भाई की बँदूक वापस करने के लिए बोला। ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनों में बिछड़े भाइयों का प्रेम उमड़ आया हो, लेकिन सागर बँदूक लिए चुपचाप खड़ा रहा। उन दोनों का हृदय परिवर्तन देख, सभी स्तब्ध रह गए।
सागर को विश्वास नहीं हुआ कि अमन अपनी माँ की याद में एक हजार के पुराने नोटों की गड्डी अपने सीने से लगाकर घूमता था। यह बात पूरे पुलिस स्टेशन में कोई नहीं जानता था और अगर यह बात लोग जान भी जाते, तो संभवतः कुछ लोग उसे पागल समझने लगते।
“ लेकिन भाई! ” गोलू के मन में एक संशय था जो वह अमन से पूछना चाहता था।
“ हाँ, भाई! ” अमन बोला।
“ मुझे एक बात समझ नहीं आई कि तुम्हारी माँ के गुज़रने से मोदी का क्या लेना देना? ” गोलू ने पूछा।
“ क्योंकि वह मोदी जी ही तो थे, जिन्होंने 8 नवम्बर 2016 को हज़ार और पाँच-सौ के पुराने नोट बंद कर दिए। ” अमन ने समझाया।
“ ऐ… हमें पागल समझा है क्या? ” अचानक गोलू कि भावुकता कहीं छूमंतर हो गई। उसे अमन कि बात अब झूठी लगने लगी, क्योंकि उसके हिसाब से अभी 8 नवम्बर आया भी नहीं था।
“ क्या हुआ, भाई? ” गोलू के बदले स्वर सुनकर, अमन ने विस्मय से पूछा।
“ आठ नवम्बर अभी आया नहीं और तेरी माँ आठ नवम्बर को मर भी गई। मुझे पागल समझा है क्या? ” गोलू चिल्लाते हुए बोला।
“ मेरी माँ के बारे में कुछ बोला तो मैं तेरा मुँह तोड़ दूँगा। ” अमन भड़कते हुए बोला।
उन्हें फिर से झगड़ता देख, सागर ने विचार किया, “ साँप और नेवला, कभी दोस्त नहीं बन सकते। अच्छा हुआ, मैंने बँदूक वापस नहीं की, वरना इन दोनों के झगड़े में अभी गोलियाँ चल जातीं। लेकिन ये आदमी रामचंद्र का साला ही है और अगर यह ज़िन्दा है, तो रामचंद्र भी ज़िन्दा होगा, लेकिन वो है कहाँ? कहीं उसे इन लोगों ने ही तो नहीं मार दिया और पुलिस के डर से अभी तक इस घर से छुपे हुए हैं! ”
सागर को सोफे पर बैठे उस आदमी कि तलाशी लेते वक्त, उसके पास एक पर्स और एक बँदूक मिली। पर्स में उसके साथ रामचंद्र कि एक तस्वीर भी थी। सागर ने गोलू और दयाल सिंह की बँदूकों से सारी गोलियाँ निकाल कर अपने पास रख लीं।
“ यही रामचंद्र हैं। ” सागर ने अमन को तस्वीर दिखाते हुए कहा।
“ इस सूटकेस में क्या है? ” अमन ने उस काले सूटकेस को देखते हुए पूछा, जो टेबल पर रखा हुआ था।
“ एक बहुत बड़ी रकम, इस घर को खरीदने के लिए। ” पुष्पा भंडारी ने उन्हें उस सूटकेस को खोल कर दिखाया।
“ इतने सारे पैसे तुमने अपने पूरे जीवन में नहीं देखे होंगे! ” पुष्पा अहंकार भरे स्वर में बोला।
पूरा सूटकेस एक हजार और पाँच सौ के पुराने नोटों से भरा पड़ा था, जिनकी अमन और सागर कि नज़रों में अब कोई कीमत तक नहीं थी। उन लोगों के लिए वह कोई मुद्रा नहीं, बल्कि सामान्य कागज़ थे, परंतु उन पुराने नोटों को देखकर वे दोनों आश्चर्यचकित रह गए।
“ एक मिनट! ” पुराने नोटों से भरे हुए उस सूटकेस को देखने के बाद, सागर के मन में उलझा देने वाले कई रहस्यपूर्ण विचार उपजने लगे, इसलिए अमन से कुछ बात करने के लिए वह उसे थोड़ा साइड में ले गया।
“ आपको यह सब कुछ अजीब नहीं लग रहा, इन लोगों के पास पुराने नोटों से भरा हुआ सूटकेस मिलना और इनका यह कहना कि ये लोग यहाँ, इस घर को खरीदने आए हैं। ऐसा लग रहा है जैसे हम लोग इस घर में उस दिन पर पहुँच गए हैं, जब यह लोग इस घर को खरीदने आए होंगे। क्योंकि गोलू के हिसाब से अभी आठ नवंबर आया तक नहीं है, शायद इसीलिए इनका सूटकेस पुराने नोटों से भरा हुआ है! ”
सागर की बात सुनकर अमन ने कहा, “ और यह भी तो हो सकता है कि यह लोग हमें गुमराह करने की कोशिश कर रहे हों। इसलिए सच पता लगाने का एक ही तरीका है, बहुत हो गया भाई चारा, अब इन लोगों को दबंगई दिखाने का समय आ गया। ”
“ आखरी बार पूछूँगा। ” अमन उन लोगों से बड़े अड़ियल स्वर में बोला, फिर उसने जोर से चिल्लाकर पूछा, “ रामचंद्र कहाँ हैं? ”
उसके ऊँचे स्वर से, वे सभी डर गए, उसके अचानक चीखने से उसका साथी सागर तक डर गया। वे लोग अमन से केवल इसलिए डर रहे थे क्योंकि उस सनकी के हाथ में एक बँदूक थी।
पुष्पा भंडारी ने तुरंत बिना कुछ बोले, उस हॉल के बाएँ कमरे कि तरफ इशारा किया। अमन और सागर ने उस दरवाज़े पर दृष्टि डाली, अमन ने सीधे उस हाथी को देखा, जो दरवाज़े कि उन विचित्र आकृतियों के बीच बना हुआ था।
अमन ने सागर को कनखियों से कमरे कि जाँच करने का इशारा किया। सागर ने तुरंत प्रतिक्रिया दिखाते हुए, उस कमरे कि ओर अपने कदम बढ़ाए। दरवाज़े पर पहुँचने के बाद, उसने अपनी बँदूक आगे कर बड़ी ही सतर्कता से दरवाज़ा खोला।
उसे कमरे में कोई नहीं दिखाई दिया, वह धीरे धीरे अंदर गया। वह एक बहुत विचित्र कक्ष था, उस कक्ष में कुल चार दरवाज़े थे, हर एक दीवार पर एक दरवाज़ा था, सभी दरवाज़े एक समान दिख रहे थे। वे एक ही रंग के थे और उन पर बनी आकृतियाँ एक जैसी ही थीं, जिसमें कोई भिन्नता नहीं थी।
उसने अंदर बढ़कर एक दरवाज़े को खोलकर देखा, उसके भीतर भी एक बड़ा सा कक्ष था और उस कक्ष में भी कुल चार दरवाज़े थे, ऐसा लग रहा था जैसे मानों वह किसी भूल-भुलैया में प्रवेश कर चुका था। उसने तुरंत अपने कदम पीछे कर लिए, लेकिन जब उसने पीछे मुड़कर देखा, तो उसे सभी दरवाजे बंद नज़र आए।
उसने डर के मारे तीव्रता से उस कमरे से बाहर निकलने का प्रयास किया लेकिन जैसे ही उसने वह दरवाज़ा खोला, जिस दरवाज़े से वह अंदर आया था, दरवाज़ा खोलते ही उसकी रुह काँप गई।
शरीर में एक सिरहन सी दौड़ गई और शरीर काँपने लगा। उसके देह का ताप बढ़ गया और स्वाँस गहरी हो गई। डरावने विचारों ने उसे परेशान कर दिया। उसने उस कमरे के सभी दरवाज़े खोल कर देख लिए, लेकिन किसी भी दरवाज़े से वह पुनः हॉल में नहीं पहुँच सका। हर दरवाज़े के पीछे वही कक्ष था, जिसमें फिर से चार दरवाज़े थे।
सागर को कमरे में गए बहुत समय बीत गया लेकिन वह अब तक बाहर नहीं आया था, जिस कारण से अमन को उन लोगों पर ओर अधिक संदेह होने लगा और सागर की चिंता सताने लगी। सागर उसके कारण ही उस घर में आया था, अगर उसे कुछ हो जाता तो अमन अपने आप को, कभी माफ़ नहीं कर पाता।
“ सागर कहाँ है? अंदर ओर कौन-कौन है? ” अमन ने चिंता से पूछा, उसने उस कमरे के दरवाज़े पर पुनः अपनी दृष्टि डाली, जिस कमरे के भीतर उसका साथी गया था। दरवाज़ा स्वतः बंद हो चुका था और भीतर से किसी भी प्रकार की कोई ध्वनि तक बाहर नहीं आ रही थी।
“ तु पागल हो गया है क्या! तेरे सामने तेरा साथी अंदर गया और इसी कमरे में मेरे जीजा और वो आदमी भी हैं जिससे हम यहाँ मिलने आए थे, लेकिन अब तीनों का अता-पता नहीं है। ” रामचंद्र के साले ने अपने जीजा कि चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
“ गोलू! ” उस आदमी ने गोलू को उस कमरे कि जाँच करने का इशारा करते हुए निर्देश दिया, लेकिन गोलू ने अपना काम उसके बगल में खड़े दोनों पहलवानों को सोंप दिया।
लेकिन जैसे ही उन दोनों ने अपने कदम आगे बढ़ाए, अमन ने उन्हें टोककर रोक दिया, “ कोई चालाकी नहीं, अगर कोई हिला तो खोपड़ी उड़ा दूँगा। ”
सागर को देखने के लिए, अमन उस दरवाज़े तक बहुत सतर्कता से पहुँचा, पर उसकी बँदूक कि नोक अभी भी उन लोगों पर ही जमी हुई थी, परंतु समस्या यह थी कि किसी भी समस्या से निपटने के लिए उसकी बँदूक में गोलियाँ ही नहीं थीं। वह यह सोचकर विचलित हो रहा था कि अंदर ऐसा कौन सा संकट था, जिसके कारण उसका साथी अब तक बाहर नहीं आया था। अमन के माथे पर अब बल पड़ने लगे थे, हल्की सी घबराहट उसके हृदय में विचरण करने लगी थी। उसके धैर्य का बाँध अब टूट चुका था, उसने अचानक घूम कर दरवाज़े पर एक ज़ोरदार लात मारी और दरवाज़ा धड़धड़ाकर खुल गया।
उस दरवाजे के पीछे नीचे जाती हुई सीढ़ियाँ थीं जिसके अंत पर एक अन्य दरवाज़ा था। दीवारों पर लगे प्रज्वलित रोशनदान, पीली रोशनी से दमक रहे थे। उसे नीचे अनजाने संकट कि अनुभूति हो रही
थी इसलिए उसे नीचे जाने में संकोच हो रहा था, लेकिन अपने साथी को खोजना ही अब उसकी पहली प्राथमिकता थी, इसलिए बिना अधिक समय नष्ट किए, वह नीचे उस दूसरे दरवाज़े तक जा पहुँचा। नीचे जाकर, जब उसने सिर उठाकर ऊपर देखा, तो वह दरवाज़ा बंद हो चुका था, जिस दरवाज़े से वह वहाँ तक पहुँचा था।
Comments
Post a Comment
Leave your feedback in comment section. If this story worth for a movie, Please support us.