Skip to main content

chapter 2 kotla house?

 कक्षा खचाखच बच्चों से भरी हुई थी।‌ नया सत्र प्रारंभ हुए लगभग एक महा बीत चुका था। अश्वत को न दोस्त बनाना पसंद था और न ही उसका पढ़ाई लिखाई में कोई मन था, वह चुपचाप खिड़की के पास बैठा अपनी ही दुनिया में कहीं खोया हुआ था। 


अश्वत नौवीं कक्षा में था। कक्षा में सभी बच्चों कि उम्र चौदह-पंद्रह वर्ष के आसपास थी। सर्दी के कारण, लड़कों ने लाल रंग का स्वेटर और उसके नीचे हल्के पीले रंग कि कमीज़ व ग्रे रंग कि पैंट तथा काले जूते पहने हुए थे, जबकि लड़कियों ने सफेद जूते पहने हुए थे और उन्होंने भी लाल रंग का स्वेटर और उसके नीचे हल्के पीले रंग कि कमीज़ पहनी हुई थी। लेकिन लड़कों कि भाँति लड़कियों ने पैंट नहीं बल्कि लाल रंग कि स्कर्ट पहनी हुई थी जिसकी लम्बाई उनके घुटनों के नीचे तक थी। 


सभी बच्चे अपनी गुटरगूँ में लगे हुए थे कि अचानक उनके प्रधान अध्यापक कक्षा में प्रकट हुए। उनसे विद्यालय का हर बच्चा डरता था, इसलिए नहीं कि वह बच्चों को मारते ज्यादा थे, बल्कि इसलिए क्योंकि वह भरी क्लास में बेज्जती अच्छी करते थे। 


वह लगभग एक वर्ष पूर्व इस विद्यालय में आए थे, इससे पहले वह कहीं और पढ़ाते थे। उनके आते ही कक्षा में शांति काल शुरू हो गया, सभी बच्चे एकाएक शांत हो गए, लेकिन उनके आने के बाद भी, दो लड़कियों ने अपनी खुफिया बातें करना बंद नहीं किया, उनका ध्यान अपनी ही दुनिया में था।


उन्हें देखते ही अध्यापक ने एक भयंकर गर्जना की “ तुम दोनों! खड़ी हो जाओ। ”

उनकी भयानक गर्जना से कई बच्चों का दिल दहल उठा। वे दोनों लड़कियाँ हड़बड़ा कर फटाफट खड़ी हो गईं, दोनों को अपनी गलती का आभास था।


“ जब तक मैं पढ़ाऊँ, तब तक ऐसे ही खड़ी रहो। ” अध्यापक ने अपना आदेश सुनाया। लड़कियों का चेहरा निराशा से लटक रहा था। वह लड़कियों को बड़ी अटपटी दृष्टि से देखते थे। अफवाह थी कि उन्हें उनके पुराने स्कूल से लड़कियों से छेड़छाड़ के मामले में निकाला गया था।


“ सभी बच्चे अपनी अर्थशास्त्र कि किताब निकालो। ” अपना अगला आदेश देते ही उन्होंने पूरी कक्षा में अपनी नज़र घुमाई, अपना शिकार ढूंढने के लिए लेकिन उनके विषय कि किताब कोई भी बच्चा गलती से भी लाना नहीं भूलता था। प्रमुखतः कई बच्चे तो केवल अपने बैग में अर्थशास्त्र कि ही किताब लाते थे।


“ आज मैं तुम्हें तुम्हारे भविष्य के बारे में पढ़ाऊँगा, जो तुम लोगों का आने वाला कल है, अर्थात् बेरोज़गारी। ” अध्यापक ऐसी घमंडी मुस्कान के साथ बोला जैसे वह खुद को सर्वश्रेष्ठ समझता हो।


“ भारत में लगातार कुछ मूर्ख बच्चे पैदा करने में लगे पड़े हैं जिसके कारण जनसंख्या तो बढ़ ही रही है, लेकिन जनसंख्या के विपरीत काम कम होता जा रहा है। ” उनकी बातें सुनते ही बच्चों ने अपनी हँसी छुपाने के लिए अपने मुँह को अपने हाथ से ढक लिया। उनका प्रवचन सदैव उल-जलूल बातों के साथ हास्यास्पद और कड़वे शब्दों के साथ जागरूकता भर देने वाला होता था।


“ मैं दूसरों के बारे में क्या कहूँ, मेरे माँ-बाप खुद गधे थे। मुझे पैदा तो किया, पर क्यों! क्योंकि मुझसे पहले उनकी पाँच लड़कियाँ जो हुईं थीं, इसलिए लगे रहे, जब तक मैं पैदा नहीं हुआ। लड़का चाहिए है ना सबको। ”


“ मेरी बहनों कि शादी हो गई। ” वह कुछ देर शांत रहकर अचानक बोले। “ वे सभी नौकरी करें या ना करें लेकिन उनके पतियों को नौकरी करनी पड़ती है, अपने परिवार का पेट पालने के लिए, उनका ध्यान रखने के लिए। इसलिए सही मायनों में यह सवाल लड़कों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या... करोगे? क्योंकि नौकरी है… तो छोकरी है। तुम में से कोई डॉक्टर बनेगा, कोई इंजीनियर बनेगा तो कोई नाली साफ करेगा, लेकिन सबका भविष्य अच्छा नहीं होने वाला है क्योंकि कुछ लोगों को तो नाली साफ करने का काम भी नहीं मिलेगा, इसलिए तुम में से कई लोग बनोगे बे...रोज...गार। ”


कक्षा के सभी बच्चों का ध्यान अपने अध्यापक पर केंद्रित था लेकिन अश्वत का ध्यान कक्षा से बाहर था। उसकी दृष्टि तो खिड़की से बाहर पक्षियों को यहाँ वहाँ उड़ते देखने में संलग्न थीं। वह लगातार खिड़की से बाहर देख रहा था।


अचानक एक डरा देने वाली आवाज़ उसके कानों में पड़ी, “ अश्वत! अश्वत नाम ही है ना तुम्हारा! ” अध्यापक ने बड़े कठोर स्वर में पूछा।


“ जी सर! ” अश्वत ने अकबकाते हुए अपना सिर हिलाया।


“ मैंने क्या बताया अभी? ” अध्यापक ने पूछा।

“ आपने! ” अश्वत ने एक मूर्खतापूर्ण सवाल पूछा।

“ नहीं पड़ोसी ने। ” अध्यापक ने तंग होकर कहा।


अश्वत के बगल में बैठी लड़की ने उसे एक खाली कागज़ पर उत्तर लिखकर इशारा किया। उस लड़की ने कागज़ पर लिखा था, ‘ हम सभी बेरोजगार बनेंगे। ’


“ हम सभी बेरो... ” अश्वत अपना सिर झुकाकर बस इतना ही पढ़ पाया कि अचानक उसके अध्यापक पुनः चीख पड़े, “ सामने देखकर बता। ”


“ आ... हम सभी बेरोजगार हैं! ” अश्वत ने खड़े होकर घबराते हुए जवाब दिया। यह जानते हुए भी कि वह गलत उत्तर दे रहा था, फिर भी उसने अध्यापक के सामने बोलने कि चेष्टा की।


“ अबे गधे तेरा ध्यान कहाँ है। एक झापड़ में गाल लाल हो जाएगा, निकलजा मेरी क्लास से। ” अध्यापक ने बड़ी क्रूरता से कहा, हर बच्चे कि दृष्टि अश्वत पर ही थी। अश्वत किसी से भी दृष्टि मिलाकर स्वयं को लज्जित महसूस नहीं करना चाहता था, इसलिए अश्वत बिना किसी छात्र से नजरें मिलाए चुपचाप सिर झुकाकर कक्षा से बाहर निकल गया।


अश्वत अपना मन बहलाने के लिए विद्यालय के परिसर में अध्यापकों से नज़रें बचाते हुए इधर-उधर घूमने लगा। वह घूमते घूमते विद्यालय के पीछे बने क्रीड़ा स्थल पर जा पहुँचा जिसके द्वार पर ताला लगा हुआ था। उसने सतर्कता से इधर-उधर अपनी नजरें दौड़ाईं और बड़ी शीघ्रता से उस द्वार पर चढ़कर दूसरी तरफ कूद गया। वह अक्सर ऐसा करता था क्योंकि क्रीड़ा स्थल पर उसे अकेले घूमने में बहुत आनंद आता था।


क्रीड़ा स्थल चारों तरफ से छः फुट ऊँची दीवारों से घिरा हुआ था और दीवारों के ऊपर कांटे वाले तार लगाए गए थे, ताकि बच्चे दीवार कूदकर विद्यालय से भाग न सकें।


उस क्रीड़ा स्थल में आने जाने के लिए दो द्वार थे लेकिन जिस द्वार से अश्वत कूदकर अंदर आया था, उस द्वार के निकट ही एक बाथरूम बना हुआ था जिसके पीछे से अश्वत को कुछ बच्चों कि फुसफुसाहट सुनाई दी।


अश्वत ने बाथरूम के पीछे देखा जाकर तो वहाँ बारहवीं कक्षा के तीन छात्र विद्यालय से भागने का प्रयास कर रहे थे। अश्वत को वहाँ सिगरेट के धुएँ कि तीव्र दुर्गंध आ रही थी, उस स्थान पर सिगरेट के कई टुकड़े पड़े हुए थे। उन तीनों छात्रों कि उम्र सतरा-अठारहा के आसपास थी। एकाएक अश्वत के वहाँ प्रकट होते ही उन सभी कि बोलती बंद हो गई, तभी अश्वत कि दृष्टि अपने बड़े भाई पर पड़ी।


अश्वत की आहट सुनते ही मेघना ने अपनी सिगरेट फेंक दी और एक अच्छी बच्ची की तरह सावधान खड़ी हो गई। उसे लगा जैसे कोई अध्यापक आ रहा हो, लेकिन किसी अध्यापक के स्थान पर उस लड़के को देखते ही उसने राहत की साँस ली।


“ अश्वत! तू यहाँ क्या कर रहा है? ” उन तीनों में से एक लड़के ने अश्वत से पूछा, उसका नाम रचित था और वह अश्वत के मामा का लड़का था।


अश्वत कुछ बोलता उससे पहले ही रचित के पीछे खड़ा विक्रम आगे आकर बोला, “ ये तो वही है जिसने एनुअल डे पर बाहुबली फिल्म का ‘ कौन है वो ’ गाना गाया था। ”


“ कौन है वो! कौन है वो! कहाँ से वो आया? और यहाँ क्या कर रहा है? ” विक्रम ने गाते हुए पूछा।


“ कुछ नहीं। ” अश्वत के मुँह से बड़ी हल्की आवाज़ निकली।


“ अच्छा, यहाँ आओ। ” विक्रम ने प्रेमभरे स्वर में अश्वत को अपने पास बुलाया। अश्वत का भोला चेहरा देखकर, विक्रम अपने मित्रों को कनखियों से देखकर मुस्कुराया जैसे उसके मन में अभी-अभी किसी नए विचार ने जन्म लिया हो।


“ घूमने चलेगा हमारे साथ? ” विक्रम ने अश्वत से पूछा। 


“ हम इसे अपने साथ ले जाकर क्या करेंगे? ” रचित ने विरोध करते हुए कहा।


“ तुम लोग जा कहाँ रहे हो और यहाँ से बाहर कैसे निकलोगे। ” अश्वत ने पूछा।


“ देखा! इसका मन भी है चलने का। क्या खुराफ़ाती सवाल पूछा है, यहाँ से बाहर कैसे निकलोगे? ” विक्रम ने उत्साहित स्वर में रचित से कहा।

“ यह कहीं नहीं जाना चाहता, बस ऐसे ही पूछ लिया इसने। ” रचित बोला।

“ चलना है या नहीं? हाँ या ना में जवाब दे। ” विक्रम ने तुरंत अश्वत से पूछा।


अश्वत ने अपना सिर ना में हिलाकर विक्रम को अपना जवाब दिया।


विक्रम बहुत ही अड़ियल और उद्दंड लड़का था। उसे ना सुनना पसंद नहीं था, अश्वत द्वारा उनके साथ जाने से मना करते ही विक्रम भड़क उठा और अपने दोनों हाथों से कसकर उसका कॉलर पकड़ लिया।


“ क्या कर रहा है, भाई! पागल हो गया है क्या! ” रचित तुरंत विक्रम को रोकने के लिए आगे आया। “ इसे साथ ले जाकर क्या करना है? ”

रचित और अश्वत अपनी पारिवारिक दुश्मनी के कारण आपस में बोलचाल नहीं रखते थे, इसलिए रचित उसे अपने साथ ले जाना नहीं चाहता था, लेकिन विक्रम अश्वत को अपने साथ ले चलने का पूरा मन बना चुका था।


मेघना जो विक्रम कि बहन थी, उसे अश्वत कि हालत देखकर मज़ा आ रहा था। दोनों भाई बहन एक जैसे ही थे, दूसरों को सताना और उनकी दयनीय हालत पर हँसने में उन्हें बहुत आनंद आता था।


“ अब आखरी बार पूछता हूँ, चलेगा या नहीं? ” विक्रम ने कठोर शब्दों में कहा।


अश्वत ने इस बार अपना सिर हाँ में हिलाया क्योंकि वह भी विद्यालय से बाहर जाकर घूमना चाहता था। भले ही रचित और अश्वत के आपसी संबंध मधुर नहीं थे लेकिन जब रचित साथ में जा ही रहा था, तो अश्वत को भी साथ चलने में कोई समस्या नहीं थी और उसका हाँ करने का दूसरा कारण विक्रम का डर भी था, इसलिए वह साथ चलने को तैयार हो गया।


“ तेरा class teacher कौन है? ” विक्रम ने पूछा।

“ अमित जोशी! ” अश्वत ने घबराते हुए जवाब दिया।

“ बड़ा मादर*** है वो। ”


विक्रम ने रचित को कंखियों से कुछ इशारा किया और रचित उसकी बात समझ गया। रचित ने दीवार के सहारे इकट्ठे पत्तों को साफ किया और पत्तों के ढेर के पीछे छुपे, एक लकड़ी का फट्टा हटाया। फट्टा हटते ही अश्वत को दीवार में एक छेद दिखाई दिया।


रचित ने अपना बैग बाहर फेंका और फिर खुद भी उस छेद से बाहर चला गया और उसके बाद विक्रम ने मेघना को बाहर निकलने का इशारा किया। 


मेघना के बाद, अश्वत बाहर निकला। वह उस छेद से बहुत आराम से बाहर निकल गया और उसके पीछे विक्रम भी बाहर निकल आया। अश्वत के बाहर आते ही, मेघना ने तुरंत अपने गुलाबी बैग से एक छोटा सा आईना निकाला और बैग अश्वत को पकड़ा दिया। मेघना आईना देखते हुए अपना चेहरा और बालों को संभालने लगी।


सड़क पर निकलते ही विक्रम ने एक ऑटो आता देखा और उसे अचानक हाथ दिखाकर रोकने का प्रयास किया।


उस ऑटो वाले ने अचानक ब्रेक मारा, फिर भी ऑटो उन लोगों से कुछ आगे जाकर रूका। ऑटो रुकते ही, ऑटो वाले ने केवल अपना सिर बाहर निकाल कर पीछे देखा और इशारे में अपनी भौंहें उचकाते हुए पूछा, “ कहाँ जाना है? ”


विक्रम उसके पास गया और उसे कोटला हाउस चलने के लिए कहा, “ कोटला हाउस! ”


“ वहाँ जाके का करेगा? ” ऑटो वाले ने हैरानी से पूछा।


ऑटो वाले के मुँह में पान भरा हुआ था, वह बार-बार अपना मुँह ऊपर उठाकर बात कर रहा था। ताकि उसका कीमती पान मुँह से निकल कर ज़मीन पर न गिर जाए।


“ चलना है या नहीं! ” विक्रम ने फिर से पूछा।


“ तीन हज़ार लगेंगे। ” ऑटो वाले ने एक बड़ी कीमत माँगी, जो सामान्य मूल्य से तीन गुना अधिक थी।


“ पंद्रह सौ! ” विक्रम ने आधा दाम लगाया। लेकिन उसके द्वारा पंद्रह सौ बोलते ही ऑटो वाला तुरंत मान गया, “ बईठो। ”


विक्रम को बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऑटो वाला इतनी जल्दी मान कैसे गया? लेकिन अब कीमत तय हो चुकी थी जिसमें कोई फेर-बदल नहीं किया जा सकता था और उन्हें देर भी हो रही थी इसलिए विक्रम ने अपना सिर ऑटो कि तरफ झटकते हुए, अपने सभी साथियों को ऑटो में बैठने का इशारा किया।


रचित और मेघना तुरंत जानवरों कि तरह ऑटो में बैठ गए आकर, लेकिन अश्वत वहीं मेघना का बैग लिए खड़ा रहा।


“ चलें! ” विक्रम ने ऊँचे स्वर में अश्वत को भी ऑटो में बैठने का संकेत किया।

अश्वत भी ऑटो में बैठ गया आकर, लेकिन वे चारों सही से ऑटो में एडजस्ट नहीं हो पा रहे थे। अश्वत को छोड़, वे तीनों अपनी सुविधा अनुसार ऑटो कि सीट से अपनी कमर चिपका कर आराम से बैठ गए, लेकिन अश्वत को सीट के किनारे पर अपना एक कूल्हा लटकाए चुपचाप बैठना पड़ा।


मेघना उसके ठीक बगल में बैठी थी, वह अश्वत से उम्र में बड़ी थी लेकिन अश्वत को उसके करीब बैठकर शर्म आ रही थी। उसके करीब बैठकर उसे बहुत अजीब महसूस हो रहा था।


अचानक मेघना ने अश्वत से अपना बैग छीनकर, अपने हाथ में पकड़ा आईना बैग में वापस डाल दिया और फिर उसमें से अपना मोबाइल निकालकर, वापस से बैग अश्वत को पकड़ा दिया। जहाँ एक और विद्यालय में मोबाइल लाने पर प्रतिबंध था, वहीं दूसरी ओर कुछ उद्दंड बच्चे विद्यालय के नियमों को तोड़ने मैं अपनी शान समझते थे।


मेघना ने अपने मोबाइल से सेल्फी खींचना प्रारंभ कर दिया। अश्वत मेघना को कनखियों से देख रहा था। रचित तो मेघना के साथ सेल्फी खिंचवाने में व्यस्त था, लेकिन विक्रम चुपचाप बैठा ना जाने क्या सोचता रहा।


“ वइसे तुम लोग कोटला हाउस का करने जा रहे हो? ” ऑटो वाले ने पूछा।


अपना प्रश्न पूछने के बाद, उसने महसूस किया कि उसके मुँह में पान का रस आवश्यकता से अधिक भर चुका था, इसलिए उसने किसी बंदूक की तरह अपने मुँह से ऐसी गोली चलाई कि उसके मुँह से निकलने वाला सारा तरल पदार्थ ऑटो से बाहर जा गिरा।


ऑटो वाले कि बात सुनकर अश्वत की आँखें विस्मय से फैल गईं। वह कोटला हाउस का नाम सुनते ही चौंक गया।


“ हम लोग कोटला हाउस जा रहे हैं? ” उसने घबराते हुए पूछा। अब मेघना के सामने उसकी शर्म कहीं लुप्त हो चुकी थी।


“ मुझे यहीं उतार दो, मैं कहीं नहीं जाऊँगा। प्लीज़, मुझे यहीं उतार दो, मैं कहीं नहीं जाऊँगा। ” अश्वत किसी मछली कि तरह छटपटाने लगा।


उसे छटपटाते देख विक्रम यह सोचने लगा कि कहीं ऑटो वाला यह न समझ ले कि वे लोग अश्वत को जबरदस्ती अपने साथ ले जा रहे थे। तभी विक्रम ने अपनी भौंहें सिकोड़ कर मेघना को अश्वत को शांत कराने का इशारा किया।


मेघना अश्वत से चिपक कर बैठ गई और अपना एक हाथ उसके कंधे पर और दूसरा हाथ उसके गाल पर रखकर, अश्वत कि आँखों से आँखें मिलाकर बोलना शुरू किया, “ सुनो, क्या तुम्हें हम पर भरोसा नहीं, हम लोग कोटला हाउस नहीं बल्कि गर्म पानी की झील देखने जा रहे हैं, जो कोटला हाउस के ही पास है। उस घर को देखना तो दूर, हम उसके पास भी नहीं भाटकेंगे, विश्वास करो। ”


“ पक्का! ” अश्वत ने अविश्वास से पूछा। मेघना ने अपना सिर हिलाया।


“ अब शांत रहोगे ना? ” मेघना ने बड़े प्रेम से पूछा। अश्वत ने हाँ में अपना सिर हिलाया जैसे वह उसकी बात अच्छे से समझ चुका हो। मेघना ने अश्वत को इतने प्रेम से अपने वश में कर लिया मानो उसके पास लोगों को वश में करने कि कोई अमानवीय शक्ति हो।


“ कोटला हाउस का नाम सुनते ही ये बऊरा काहे गया भाई! ” ऑटो वाले ने विस्मयादिबोधक भाव से पूछा। 


“ कोटला हाउस का नाम सुनने से कौन नहीं डरता और उसके नाम से तो पूरा शहर डरता है। ” विक्रम ने जवाब दिया।


“ लेकिन हम किसी के बाप से नहीं डरते इसलिए हमारे सिवा तुम्हें दूसरा कोई कोटला हाउस लेकर भी नहीं जाता। ” ऑटो वाले ने बोलना शुरू किया।


“ तुम लोग वहाँ कुछ भी करो जाकर हमें उससे का मतबल, हमारा काम है सवारी को उसकी मंजिल तक पहुँचाना,‌ उन्हें उनकी मंजिल पर पहुँचाने के बाद, हमारी जिम्मेदारी खतम और फिर ना तुम हमको जानो - ना हम तुमको जाने।


लेकिन कोटला हाउस जाना, है बहुत खतरनाक, हमारी जगह कोई ओर होता तो तुम लोगों को कतई नहीं ले जाता लेकिन बो तो हम हैं जो ले जा रहे हैं, हमें देख के तो अच्छे-अच्छे भूत भाग जाते हैं, हम भूत से काहे डरें।


वइसे‌!… हमें लगता है कि बस लोगन को डराने के लिए, सरकार ने ये सब खाली का हऊआ फैला रखा है। सुना है, सरकार ने उस घर में... बो का होता है जो पृथ्वी के बाहर से आते हैं? ” ऑटो वाले ने अचानक अपनी बात को अधूरा छोड़ते हुए पूछा।


“ एलियन! ” अश्वत ने सोचते हुए उत्तर दिया।


ऑटो वाले ने एक बार पुनः ऑटो से बाहर थूकते हुए अपना मुँह खाली किया और अश्वत के उत्तर से सहमत होते हुए बोला, “ हाँ... आलियन, सरकार ने उस घर में आलियन कि जेल बना रखी है। ”


“ एलियन! सच में! उस घर में एलियन्स हैं? ” अश्वत को ऑटो वाले कि रहस्यपूर्ण बातें सुनने में आनंद तो आ रहा था, पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन फिर भी वह कोटला हाउस के बारे में ओर अधिक जानना चाहता था। इसलिए केवल अश्वत ही था जो ऑटो वाले कि बातें सुन रहा था।


“ तभई तो सरकार भी उस घर का संरक्षण कर रही है। ” ऑटो वाले ने अपना तर्क देते हुए कहा।


“ तो फिर सरकार वहाँ पर पुलिस या आर्मी को तैनात क्यों नहीं करती? ” अश्वत ने बड़ी जिज्ञासा से प्रश्न पूछा।


“ पुलिस कि का जरुरत है, जब लोगन के डर से ही काम चल रहा है। ”


“ लोगन! x-men वाला। ” अश्वत ने ऑटो वाले का मज़ाक उड़ाते हुए कहा क्योंकि वह बार-बार लोगों को ‘लोगन’ कहकर संबोधित कर रहा था। 


“ का बकलोली कर रहा है पागल, लोगन का मतबल नहीं पता? ” ऑटो वाला गुस्से में बोला।


अश्वत को उम्मीद नहीं थी कि वह ऑटो वाला उसका अपमान कर देने वाला उत्तर देगा। अश्वत कि बेज्जती पर मेघना और रचित अपने होंठ दबाए मंद-मंद हस रहे थे। अश्वत ऐसा महसूस कर रहा था जैसे भरी सभा में उसे फिर से अपमानित किया गया हो, संभवतः आज उसका दिन ही बुरा था। 


उसके बाद अश्वत तो चुप हो गया लेकिन वह ऑटो वाला पूरे रास्ते लगातार पकर-पकर करता रहा। लगभग एक घण्टे में वे लोग कोटला हाउस पहुँच गए, ऑटो वाले कि बातें सुनते-सुनते अश्वत को समय का पता ही नहीं चला कि वे लोग कोटला हाउस कब पहुँच गए।


विक्रम पूरे रास्ते चुपचाप बैठा रहा लेकिन रचित और मेघना अपनी ही बातों में लगे रहे और मेघना ने तो पूरे रास्ते सेल्फी खींचने का रिकॉर्ड ही तोड़ दिया था। लेकिन अश्वत के पास ऑटो वाले कि बातें सुनने के अलावा दूसरा कोई अन्य विकल्प नहीं था।


ऑटो वाला बड़ा ही बड़बोला था, उसकी बात कोई सुने या ना सुने लेकिन वह पूरे रास्ते बोलता रहा और बार-बार थूकता रहा। अश्वत के मन में बार-बार विद्यालय का विचार आ रहा था कि अगर उसके प्रधान अध्यापक को पता चला कि वह विद्यालय से भाग चुका है तो वो उसकी बैंड बजा के रख देंगे और उसके माता-पिता से भी उसकी शिकायत कर देंगे, बस यही डर अश्वत कि चिंता का कारण था। अश्वत को ऑटो में बैठने से बहुत परेशानी हो रही थी, वह ठीक से बैठ नहीं पा रहा था, लेकिन इस बात से मेघना या विक्रम किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था।


“ यह रहा तुम्हारा कोटला हाउस, अब हियाँ तुम लोग जिओ या मरो, ब..ब.. हमारा मतबल है के तुम लोग हियाँ घूमो-फिरो, कुछ भी करो हमारा हैडक नहीं है। ” ऑटो वाले ने अपनी जुबान को संभालते हुए बोला।


“ लेकिन कोटला हाउस गूगल मैप पर नज़र क्यों नहीं आ रहा है? ” मेघना ने ऑटो वाले से पूछा। “ अरे! ये नेटवर्क कहाँ चले गए, अभी तो आ रहे थे। ” अचानक मेघना के मोबाइल से नेटवर्क लापता होते ही, वह परेशान होकर बोली। उस स्थान पर नेटवर्क नहीं मिलते थे, इसलिए वहाँ किसी को कॉल करके भी नहीं बुलाया जा सकता था।


“ नेटवरक नहीं मिलते हियाँ और गूगल मेप कि का जरुरत है, बो रहा तुम्हारा कोटला हाउस। ” ऑटो वाले ने जंगल के भीतर इशारा करते हुए कहा।


वे चारों ऑटो से नीचे उतरे और विक्रम ने ऑटो वाले को पंद्रह सौ रुपए देते हुए कहा, “ यहीं रुकना, हम लोग अभी आते हैं। ”


“ वापस जाने का पाँच हजार लगेगा। ” इस बार ऑटो वाले ने अपना हुकुम का इक्का फेंका और दिल खोलकर एक तगड़ी रकम माँगी।


उस मार्ग पर व्यापारिक वाहन बहुत कम ही आते थे और अगर आते भी थे, तो कोटला हाउस के डर के कारण कोई भी उस जंगल के बीच में अपनी गाड़ी नहीं रोकता था। वह उन लोगों कि इसी बात कि मजबूरी का लाभ उठना चाहता था।


“ क्या? पाँच हजार! ” विक्रम वापस जाने कि कीमत सुनकर अकबका गया और ऑटो वाले पर भड़क उठा। मेघना और रचित के होश उड़ गए लेकिन अश्वत के भाव एक समान ही बने रहे क्योंकि उसे आने-जाने के खर्चे से कोई लेना देना नहीं था।


“ पागल समझा है क्या? आने के पंद्रह-सौ और जाने के पाँच हजार। एक घण्टे में एक महीने कि कमाई करना चाहता है क्या? ” विक्रम भड़कते हुए बोला, ऑटो वाला उससे उम्र में काफी बड़ा था लेकिन उसे इस बात कि कोई चिंता नहीं थी कि उसे अपने से बड़े से किस प्रकार बात करनी चाहिए। क्रोध आने पर, वह छोटा बड़ा नहीं देखता था और किसी से भी भिड़ जाता था।


“ देखो, बत्तमीजी तो हमसे करो मत, हम बहुत बत्तमीज आदमी हैं। केबल आने कि बात हुई थी, जाने कि नहीं, इसलिए पाँच हजार देना है तो दो, बरना हम चले। ” ऑटो वाले ने अड़ियल स्वर में जवाब दिया और अपना ऑटो घुमाया तथा वापस जाने का दिखावा करने लगा। तभी विक्रम ऊँची आवाज़ में ऑटो वाले को सावधान करते हुए चिल्लाया, “ रुको! हम लोग वापस कैसे जाएंगे? ”


ऑटो वाला अचानक रुक गया। विक्रम समझ चुका था कि ऑटो वाले से बहस करने का कोई फायदा नहीं था इसलिए उसने अपने दोस्तों से पाँच हजार रुपए इकट्ठा करना शुरु कर दिया।


“ यह ऑटो वाला तो बड़ा हरामी निकला यार! ” रचित ने हल्के से विक्रम के समीप आकर कहा।


“ सही कहा तुने, लेकिन अभी इससे बहस करने का कोई फायदा नहीं है। तेरे पास कितने रुपए पड़े हैं? ” विक्रम ने रचित से पूछा।


“ मेरे पास सिर्फ हजार रुपए हैं। ” रचित बड़े फीके मन से बोला।


“ और तेरे पास। ” 


“ तू पागल है क्या! मेरे पास रुपए कहाँ हैं! और वैसे भी, अपनी छोटी बहन से कौई रुपए माँगता है क्या। ” मेघना विक्रम को बड़े भाई का फर्ज़ याद दिलाते हुए बोली। विक्रम कभी भी मेघना से रुपए नहीं माँगता था और ना ही वह उससे अधिक बहस करता था।


“ और तेरे पास? कुछ है या नहीं! ” अश्वत को अपनी अंतिम उम्मीद समझकर, विक्रम ने उससे भी पूछ ही लिया। वे तीनों अश्वत को ही घूर रहे थे और उसके उत्तर कि प्रतीक्षा कर रहे थे।


“ मेरे पास बस ये दस रुपए हैं। ” अश्वत ने अपनी जेब से दस का नोट निकालकर, विक्रम को देते हुए कहा।


“ दस रुपए में क्या होता है, स्टूपिड! ” मेघना ने अश्वत का दस का नोट छीनते हुए कहा। मेघना को छोटी-छोटी बातों पर दूसरों को पागल घोषित करने में अधिक समय नहीं लगता था।


“ का सोचा है? हम रुकें या जाएँ? ” ऑटो वाला उनके निर्णय कि प्रतीक्षा करते हुए बोला।


“ रुको, हम अभी आते हैं। ” विक्रम बडे़ धैर्य से बोला। सबके मन में यही प्रश्न उठा कि विक्रम पाँच हजार रुपए कहाँ से देने वाला था।


“ रुकने का हजार रुपए एक्स्ट्रा लगेगा, वो भी एडवांस। ” ऑटो वाले ने बड़ी ही बेशर्मी से पुनः वहाँ खड़े रह कर केवल प्रतीक्षा करने के हजार रुपए माँग लिए, क्योंकि वह अच्छे से जानता था कि मात्र वही एक व्यक्ति था, जो उस जंगल में उन बच्चों की वापस लौटने की आखिरी उम्मीद था।


उसकी यह बात सुनते ही विक्रम का खून खौल उठा, उसने गुस्से में उस ऑटो वाले का सिर फोड़ने के लिए पास में ही पड़ा एक पत्थर उठा लिया, रचित विक्रम का गुस्सा भाँप गया और उसे शान्त करते हुए, वह ऑटो वाले के पास गया और अपनी जैब से हजार रुपए निकाल कर, ऑटो वाले को देते हुए कहा, “ अब जब तक हम वापस न आ जाएँ, तब तक यहाँ से हिलना मत। ”


“ चल यार! फटाफट अपना काम करते हैं और निकलते हैं यहाँ से। ” रचित ने विक्रम से कहा। वे तीनों जंगल के भीतर कोटला हाउस कि तरफ बढ़े। अश्वत भी मेघना का बैग लिए उनके पीछे चल दिया।


उस जंगल में कोटला हाउस को ढूँढते-ढूँढते उनकी हालत खराब हो गई, लेकिन परिश्रम कभी व्यर्थ नहीं जाता। उन सभी ने अपनी दृष्टि ऊपर उठाकर देखा तो वृक्षों कि आड़ में छुपा कोटला हाउस दिखना प्रारंभ हो गया। कोटला हाउस पर नज़र पड़ते ही वे तीनों खुश भी हुए और डरने भी लगे, लेकिन उनके भीतर छुपा डर अभी चेहरे पर प्रकट नहीं हुआ था।


वे लोग फटाफट कोटला हाउस के बाड़े तक पहुँच गए, बाँस के टुकड़ों से बना हुआ वह बाड़ा, लक्ष्मण रेखा कि तरह उस घर कि सुरक्षा कर रहा था।


विक्रम उस घर को सामने से देखने के बाद, मानो स्वयं से बोला, “ वीडियो में भी ऐसा ही दिख रहा था। ” 


“ लेकिन हकीकत में ज्यादा डरवाना है। ” मेघना बोली।


“ अब तक सिर्फ कहानियाँ सुनी थीं, लेकिन आज मैं पहली बार अपनी आँखों से इस घर को देख रहा हूँ। ” अश्वत बोला।


“ तुझे क्या लगता है, हम यहाँ रोज़ टहलने आते हैं। ” विक्रम अश्वत से ऐंठकर बोला, मेघना मुस्कुराने लगी। 


“ पर वो झील कहाँ है, जो हम देखने आए थे? ” अश्वत ने पूछा।


अश्वत के प्रश्न पर इस बार मेघना की हँसी छूट गई और विक्रम भी मुस्कुराने लगा, क्योंकि वे लोग उसे झूठ बोलकर वहाँ लाए थे। उस जंगल में एक विचित्र सन्नाटा छाया हुआ था, जिसे भंग करते हुए कुछ पक्षियों का एक झुंड, कलरव करते हुए, उस घर के ऊपर से उड़ कर गया।


आसमान में स्वतंत्र रूप से उन पक्षियों को उड़ता देख, अश्वत के हृदय को बहुत आनंद मिलता था, वह घण्टों इसी तरह पक्षियों को उड़ता देख सकता था। उन पक्षियों को उड़ता देख, वह कुछ देर के लिए यह भी भूल गया कि वह कोटला हाउस के समक्ष खड़ा था।


कोटला हाउस के पास, वे चारों अचानक गर्मी का अनुभव करने लगे जबकि उन सभी ने सर्दी के कारण लाल रंग का स्वेटर पहना हुआ था। 


“ अचानक गर्मी कैसे बढ़ गई! ” मेघना विस्मय से अपना स्वेटर उतारते हुए बोली। उसके स्वेटर उतारते ही दिन कि रोशनी में हल्के पीले रंग कि उसकी कमीज़ दमक उठी।


बिना स्वेटर के मेघना बहुत ही आकर्षक लग रही थी, सूर्य के प्रकाश में उसकी खूबसूरती को चार चाँद लग गए और अश्वत और रचित कि दृष्टि मेघना पर ही टिकी रह गई। विक्रम उन दोनों की दृष्टि अपनी बहन से हटाने के लिए अचानक उनका ध्यान भंग करते हो बोला, “ अब अंदर चलकर देखना है या नहीं! ”


“ हाँ! हाँ! चलना‌ है, क्यों नहीं चलना, चलना है, ज़रुर चलना है। चलो! ” रचित तुरंत मेघना से अपना ध्यान हटाते हुए, हड़बड़ाकर बोला।


“ अंदर! अंदर चलकर क्या करना है, हम तो झील देखने आए थे ना? ” अश्वत ने घबराते हुए पूछा।


“ मिस्ट्रीडूम का कभी नाम सुना है? ” रचित ने पूछा।


“ नहीं सुना, लेकिन उसका इस घर से क्या लेना देना? ” अश्वत परेशान होकर बोला।


“ मिस्ट्रीडूम नाम के एक यूट्यूबर ने, जिसने इस घर के अंदर जाकर एक वीडियो बनाया था, उसने लोगों को एक चेलेंज दिया था कि जो भी उसकी तरह अंदर से कोटला हाउस का वीडियो बनाकर लाएगा, वो उसे पाँच लाख रुपए देगा इसलिए इससे पहले दूसरे शहरों से लोग यहाँ आने लगें, उनसे पहले हम ही यह वीडियो बनाकर पाँच लाख रुपए जीत लें। ” रचित ने अश्वत को‌ समझाया।


“ पाँच लाख रुपए! अगर वो झूठ बोलता हुआ तो? क्या पता वो इस घर में आया हि न हो? इस घर को किसी ने भी अंदर से नहीं देखा है, तो तुम कैसे कह सकते हो कि उसने इसी घर में आकर वीडियो बनाया था। ” अश्वत ने अपनी तर्कशक्ति का प्रदर्शन करते हुए कहा।


“ उसने इस घर में वीडियो बनाया हो या ना बनाया हो लेकिन अगर हमारा इस भूतिया घर का वीडियो वायरल हो गया, तो हम अच्छा खासा पैसा कमा सकते हैं और अगर मिस्ट्रीडूम का वो विडियो झूठा है, तो हो सकता है कि उसका झूठ भी सबके सामने आ जाए। समझा! ” मेघना ने अश्वत से कहा।


“ और अगर इस घर में सच में भूत हुआ तो? ” अश्वत ने घबराते हो पूछा।


“ भूत-वूत कुछ नहीं होता है, स्टुपिड। ” मेघना बोली। मेघना कि बात सुनने के बाद अश्वत चुप तो हो गया लेकिन उसका हृदय शांत होने के स्थान पर और अधिक गति से धड़कने लगा।


अचानक उन पक्षियों का झुंड फिर से कलरव करते हुए उस घर के ऊपर से उड़कर गया, अश्वत पुनः उन्हें देखने लगा। जब अश्वत का ध्यान उन पक्षियों से हटा, तो उसने देखा मेघना और विक्रम बाड़े के अंदर प्रवेश कर चुके थे।


“ चलें! बड़ा शौक था ना घूमने का। ” रचित भी अश्वत को व्यंग भरे स्वर में कहता हुआ, उन दोनों के पीछे चल दिया।


डरा हुआ अश्वत कुछ देर के लिए अपने स्थान पर ही खड़ा रहा, वह अकेला घर भी नहीं जा सकता था और अपने सामने खड़े उस भूतिया घर में भी नहीं जाना चाहता था, लेकिन उस जंगल में अकेले खड़े रहने में भी उसे डर लग रहा था इसलिए मजबूरी में ही सही, वह भी उन लोगों के साथ हो लिया।


“ तुम्हारे पास पाँच हजार रुपए हैं भी या नहीं? ” मेघना ने विक्रम से पूछा।


“ नहीं। ” विक्रम ने ना में सिर हिलाया।


“ फिर ऑटो वाले को रुपए कहाँ से दोगे? ”


“ तुम दे देना, मैं तुम्हारे वापस कर‌ दूँगा। ” विक्रम मुस्कुराते हुए बोला।


“ पर मेरे पास एक रुपया तक नहीं है, सच बताओ तुम्हारे पास रुपए हैं ना! ” मेघना ने ज़ोर देकर पूछा। विक्रम ने अपना सिर हाँ में हिलाया।


“ और वो रुपए कहाँ से आए? ” मेघना ने पूछा।


“ बाद में बताता हूँ। ” विक्रम ने उसकी बात को टालते हुए कहा।


उस बाड़े के भीतर घास से आवृत खुले मैदान को पार करते हुए, वे चारों बातें करते-करते उस घर के मुख्य द्वार पर जा पहुँचे। वे लोग वहाँ पहुँच तो गए लेकिन वह घर बाहर से इतना डरावना लग रहा था कि अब अंदर जाने के डर से ही सबके दिलों कि धड़कनें तीव्र हो चुकी थीं।


“ रचित! दरवाज़ा खोल जाकर। ” विक्रम ने तानाशाही स्वर में कहा।


“ अच्छा! तो तू मुझे यहाँ ये दरवाज़ा खोलने के लिए लाया है? रचित ने डरकर कहा।


“ अश्वत! तू जा। तू खोल जा कर। ” विक्रम ने अश्वत को आदेश दिया।


“ वो कहीं नहीं जाएगा, यह बात हमारे बीच की है। ” रचित ने विक्रम के आदेश कि अवेहलना करते हुए कहा। सब एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। भले ही कोई दिखा नहीं रहा था लेकिन भीतर ही भीतर डर के मारे उन सबकी फटी पड़ी थी।


“ अबे यार! यह तेरा सगा भाई थोड़ा न है, जो तू इसकी इतनी चिंता कर रहा है। ” विक्रम ने कहा। उसकी बातों से अश्वत का भय और अधिक बढ़ गया, क्योंकि वह समझ गया की विक्रम उसे अपने साथ बलि का बकरा बना कर लाया था।


“ सगा! यह एक बच्चा है और अगर इसे कुछ हो गया, तो बुआ तो मुझे मार ही डालेंगे। ” रचित अपनी चिंता व्यक्त करते हुए बोला।


विक्रम रचित की बात का विरोध करते हो बोला, “ साले कोई नहीं जानता यह हमारे साथ आया है, इसलिए अगर इसे कुछ हो भी गया तो किसी को क्या पता चलने वाला है। ”


“ ठीक है! मान लेते हैं कि अगर इसे कुछ हो भी गया तो किसी को नहीं पता चलेगा, लेकिन वह ऑटो वाला अँधा नहीं है, वो इतना हरामि है कि हम बच्चों से वापस लौटने के पाँच हजार माँग लिए।


इसलिए अगर इसे कुछ हो गया तो इस राज़ को छुपाने के लिए वो पाँच या पचास लाख कितने माँगेगा, इसका कोई अंदाजा भी नहीं है और हो सकता है, उसे इस बात का शक भी हो कि हम इसे अपने साथ जबरदस्ती लाए हैं। ”


“ मेरे पास एक आइडिया है! ” मेघना उन दोनों के बीच में बोली और वे दोनों उसके आइडिया को सुनने के लिए सहमत हो गए। 


“ तो जो सबसे पहले अपनी सिगरेट फूँक देगा, वो जीत जाएगा और जो हार जाएगा, वही दरवाज़ा खोलेगा। ”


“ लेकिन मैं सिगरेट नहीं पिता। ” अश्वत ने बोला।


“ तुझसे किसी ने पूछा? ” मेघना अश्वत से चिढ़कर बोली।


वे तीनों सहमत हुए और विक्रम ने अपने पीछे वाली पॉकेट से एक सिगरेट कि डिब्बी निकाली तथा उसमें से तीन सिगरेट निकाल कर एक साथ जलाने लगा।


“ तीन कि गिनती पर शुरू करेंगे। ” विक्रम ने नियम बताते हुए दोनों को एक-एक सिगरेट पकड़ा दी। अश्वत खुश था क्यूंकि उसे उस सिगरेट प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए नहीं कहा गया था।


“ एक, दो, तीन, गो! ” तीन तक गिनने में विक्रम ने तीन सेकेंड भी नहीं लिए। सबसे पहले विक्रम ने अपनी सिगरेट खत्म की और उसके बाद मेघना ने। ऐसा लग रहा था मानो दोनों भाई बहन बरसों से इसी क्षण कि तैयारी कर रहे थे।


रचित बिना किसी के कुछ कहे अपनी हार मान चुका था। हार के कारण, उसने अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन एक ही क्षण के बाद उसने नज़रें उठाकर उस घर कि तरफ देखा। खंडहर जैसा दिखने वाला वह घर रचित कि जान सुखा रहा था, लेकिन उस घर का दरवाज़ा खोलने कि जिम्मेदारी अब उसके ही कन्धों पर ही थी।


रचित को गर्मी लग रही थी,‌ जो शायद उसके डरे हुए मस्तिष्क से पैदा हो रही थी। रिलेक्स होने के लिए, उसने भी अपना स्वेटर उतार दिया और अश्वत को पकड़ा दिया। जिसे देखो अपना फालतू सामान अश्वत को ही पकड़ाता जा रहा था।


रचित ने दरवाज़ा खोलने से पहले खिड़की से अंदर झाँकना उचित समझा, सभी खिड़कियाँ बंद पड़ी थीं, उसने अपने हाथ के धक्के से एक खिड़की खोलने का प्रयास किया, लेकिन वह असफल रहा, फिर भी उसने उन खिड़कियों की दरारों से अंदर देखने का प्रयास किया।


उसे उन दरारों से बहुत ही धुँधला दिखाई दे रहा था। घर के अंदर काफी अंधेरा था, लेकिन रचित यह सुनिश्चित कर चुका था कि उस घर में कोई भी नहीं था।


उस घर के दरवाज़े पर ना तो कोई ताला था और ना ही कोई विशेष सूचना। रचित धीरे-धीरे घर के दरवाज़े तक पहुँचा और उसे एक झटके में धक्का देकर खोलने का प्रयास किया। लेकिन वर्षों से बंद पड़ा वह दरवाज़ा जाम हो चुका था, उसके धक्के से वह हिला तक नहीं।


उसने बहुत दम लगाया लेकिन उस दरवाज़े को अकेले खोल पाना उसके सामर्थ्य कि बात नहीं थी। रचित अपना पूरा बल लगा ही रहा था कि विक्रम भी उसका साथ देने आ गया।


दोनों एक साथ मिलकर अपना पूरा दम लगाते हुए धक्का दे रहे थे कि अचानक दरवाज़ा झटके से खुल पड़ा और रचित व विक्रम को संभलने का अवसर तक नहीं मिला और वे दोनों घर कि चौखट के भीतर जा गिरे।


उनकी इस स्थिति पर मेघना और अश्वत ठहाके मारकर ज़ोर ज़ोर से हसने लगे। वे दोनों फुर्ती से अपने कपड़े झाड़ते हुए खड़े हो गए। मेघना ने बिना डरे उन दोनों के बीच से होते हुए अंदर प्रवेश किया। लेकिन अश्वत का मन अभी भी नहीं मान रहा था, पर सबको भीतर जाता देख, उसे बाहर अकेले खड़े रहने में डर लगने लगा था इसलिए वह भी उनके साथ उस घर में घुस गया।


अपनी नजरें इधर-उधर घुमाते हुए उन चारों ने घर के भीतर प्रवेश किया। ऐसा लग रहा था जैसे वह दरवाज़ा ही उस घर कि रोशनी का मुख्य स्रोत था क्योंकि सभी खिड़कियाँ बंद पड़ी थीं।


घर के हर कोने पर मकड़ियों ने अपने आशियाने बसाए हुए थे और किसी खंडहर कि तरह पूरा घर धूल-धूसरित हो रखा था। उन सभी के कदमों से फर्श एक स्वर में बज रहा था। अश्वत ने अपने पैरों को फर्श पर दो-तीन बार ठोककर, उसे बजा कर देखा, पूरी फर्श लकड़ी कि बनी हुई थी। लेकिन पूरा घर लकड़ी से ही बना था, यह कह पाना मुश्किल था। ज़मीन पर इतनी धूल थी कि जहाँ वे लोगे पैर रखते, वहाँ उनके जूतों कि छाप छूट जाती।


घर का हॉल काफी बड़ा था, अश्वत ने महसूस किया कि वह हॉल उसके घर से भी बड़ा था। उन्होंने सिर ऊपर उठाकर देखा तो छत पर लगे वर्षों पुराने सूखे पेंट कि पपड़ियाँ छुटती नज़र आ रही थीं।


हरे रंग कि वे दीवारें इतनी पुरानी थीं कि अब उनका रंग भी फीका पड़ चुका था। उन्हें दाईं और बाईं दिवारों के बीचों-बीच एक ही दरवाज़ा नज़र आया। सभी दरवाजों के अगल-बगल में बहुत पुराने रोशनदान लगे हुए थे, जो अभी बंद पड़े थे। वह घर जितना विशाल बाहर से नहीं लगता था, उससे कहीं अधिक भीतर से था लेकिन पूरा घर खाली पड़ा था। हॉल में आगे तीन पग ऊँची सीढ़ियों के बाद, घर के पिछले हिस्से का हॉल था।


उन सभी के अंदर प्रवेश करने के बाद, अचानक से घर का मुख्य दरवाज़ा एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ स्वतः ही बंद हो गया और घर में अचान

क हल्का अंधेरा छा गया। दीवारों पर लगी सभी खिड़कियाँ अचानक गायब हो गईं, बाहर निकलना तो दूर अब वे लोग उस घर से बाहर झांक तक नहीं सकते थे।


उनके दिल दहल उठे, एकाएक चेहरे के हाव-भाव ही बदल गए, अब भीतर छुपा भय चेहरे पर साफ-साफ प्रकट हो चुका था। वे सभी उस दरवाज़े कि तरफ भागे।





















 



















































Comments

Popular posts from this blog

Pushpa the rule movie script leaked after Pushpa the rise

Pushpa: The Rise – Part 01 is a 2021 Indian Telugu-language action drama film[6] written and directed by Sukumar. Produced by Mythri Movie Makers in association with Muttamsetty Media, it stars Allu Arjun as the titular character alongside Fahadh Faasil, in his Telugu debut, and Rashmika Mandanna while Jagadeesh Prathap Bandari, Sunil, Rao Ramesh, Dhananjaya, Anasuya Bharadwaj, Ajay and Ajay Ghosh play supporting roles. The first of two cinematic parts, the film depicts the rise of a labour in the smuggling syndicate of red sandalwood, a rare wood that grows only in the Seshachalam Hills of Andhra Pradesh state.  A labourer named Pushpa makes enemies as he rises in the world of red sandalwood smuggling. However, violence erupts when the police attempt to bring down his illegal business. 1990 के दशक में, पुष्पा राज एक लेबर है, जो लाल चंदन की लकड़ी की तस्करी का काम करता है, एक दुर्लभ लकड़ी जो केवल आंध्र प्रदेश में चित्तूर जिले के शेषचलम पहाड़ियों में उगती है। जब डी.एस.पी गोविंदप्पा उ...

Kotla House chapter 3 police

 हाईवे कि चिकनी काली सड़क पर जंगल के बीचों-बीच, धुंध उड़ाती हुई, एक गाड़ी रुकी आकर जिसमें से खाकी वर्दी पहने, दो पुलिस वाले गाड़ी से नीचे उतरे। वे दोनों पुलिस वाले उन बच्चों कि तलाश में वहाँ पहुँचे थे, जिन्हें गायब हुए कई महीने बीत चुके थे। अमन रोय जिसे पुलिस कि नई नौकरी और सब इंस्पेक्टर के नए पद के साथ अभी कुछ दिन ही हुए थे। वर्दी पर दो सितारों का गुरूर उसकी आँखों में चमकता था। उसे कुछ ऐसा चाहिए था जिससे पुलिस विभाग में उसका नाम रोशन हो सके और अति शीघ्र उसकी पदोन्नति भी हो सके। अमन स्वयं को एक मसीहा समझता था, लोगों को बचाने वाला हीरो, जिसे अपने जीवन से अधिक दूसरों के जीवन कि चिंता होती है, लेकिन उसमें ऐसा कोई गुण नहीं था।  एक दिन एक ऑटो वाला पुलिस स्टेशन आया। “ सर, मेरा नाम बिपिन कुमार है और मैंने बाहर ये पोस्टर लगा‌ देखा। ” ऑटो वाले ने एक हवलदार को एक पोस्टर दिखाते हुए कहा, जिसमें अश्वत, रचित, विक्रम और मेघना कि तस्वीरें थीं। “ हाँ तो, यह तो कई महीनों से लगा है। ” हवलदार ने जवाब दिया। “ लेकिन सर, आखिरी बार मैंने इन बच्चों को कोटला हाउस के रास्ते पर छोड़ा था। उन लोगन ने कहा थ...